Home मेरी कवितायेँ ‘कमल’ तुम्हारा इतना भी भरोसा नहीं जीत पाया …

‘कमल’ तुम्हारा इतना भी भरोसा नहीं जीत पाया …

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जब हम प्यार में होते है हमे हर तरह के अनुभवों के साथ होना होता है और अपने प्यार से नहीं मिल पाने की situation में नाराजगी जाहिर करना भी आपका हक है बशर्ते आपका Partner आपको समझते हुए इसकी जगह देता हो एक बार किसी वजह से कोशिश करने के बाद भी वो मुझसे मिल नहीं पायी तो अपने गुस्से और नाराजगी को मैंने इस तरह जाहिर किया | हालाँकि मैं कभी उस से 1 से ज्यादा दिन बात किये बिना नहीं रह सकता चाहे मुझे ही उसे मनाना क्यों न पड़े |

 

“आज फिर अपने घर पहुंचा तो ये ख्याल आया
अपनेपन की ये सरल सुलभ उपलब्ध सादगी come to home
इतने दिन इस से किनारा किया ये मलाल आया ,
माँ ने मेरे इंतज़ार में पापा के लिए चाय तक नहीं बनाई
कहने लगी बेटा आया है तो जाहिर है साथ ही पिएंगे
मैंने सोचा कितना फर्क है ‘अपनों’ में और ‘अपना’ कहने में
एक ‘अपना’ वो भी है जिसने कल फ़ोन ही न उठाया ,
बस की अंतिम स्लीपर में 550 किमी के थपेड़ो से हारा
एकाएक ‘अपना सा’ कुछ पाकर मैं खुद को रोक नहीं पाया
गले से लगाया जब पापा ने तो मेरा मन रोने को आया ,
एक ये चेहरे है जो मेरी की हज़ार गलतियां भूलकर
आज भी वैसे ही और वही उम्मीदे मुझसे है लिए
एक वो ‘चेहरा’ भी है जिसके साथ समय बिताने को मैंने
बिना मोबाइल हाथ में लिए कभी चैन से खाना भी न खाया,
देखो मैं अब भी नहीं कह रहा तुम्हारी कोई गलती है और
माफ़ करना हो सकता है अब इसके कारण भी कुछ गहरे हो ,
पर इतना बड़ा हो फर्क तो दिख ही जाता है ‘पगली’
क्या हूँ मैं तुम्हारे लिए तुमने मुझसे बेहतर बता दिया
तुम आई हो कोई खबर भी नहीं ऐसा मैंने क्या दगा किया ,
चार साल के इस रिश्ते में मैंने खुद को आज भी वंही पाया
क्योकि ये तुम ही तो हो जो जताती हो कि अब भी
‘कमल’ तुम्हारा इतना भी भरोसा नहीं जीत पाया …”

कमल अग्रवाल