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आत्मविश्वाश समग्र विकास की कुंजी है -Confidence is the key to success in Hindi

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     Confidence is the key to success in Hindi – आत्मविश्वाश का हमारे चरित्र निर्माण और हमारे विकास  से गहरा संबंध है वो इसलिए क्योकि ये सर्वविदित है और इसे समझना बेहद आसान भी कि चरित्र निर्माण कैसे होता है कोई मुश्किल पहेली नहीं है असल में हमारी आदतें जो है वो इसे बनाती है हम अपने आस पास के माहौल से ग्रहण करते

है और जो हमे आनन्दयी या ख़ुशी की अनुभूति देने वाला होता है फिर चाहे वो नैतिकता की कसौटी पर खरा उतरे या नहीं हम उसे अपना लेते है और धीरे धीरे वो हमारी आदतों में शामिल हो जाता है और गाहे बगाहे हमारी बातों से झलकने लगता है जैसे कि हम कॉलेज खत्म करके घर जाते है तो दोस्तों और संगी साथियों के साथ बिताया गया वक़्त और लहजा उतनी आसानी से कन्ट्रोल नहीं कर पाते मैं खुद इसका शिकार हूँ हूँ कि अनजाने में या नींद से उठाने पर मैं कभी कभी वो गालियां देने लगता हूँ जैसी मेरी मेरे रूम मैट्स के साथ मेरी दिनचर्या में शुमार था तो इसी तरह कुछ लोग जो अधिक सक्रिय होते है और चीज़ो को सकारात्मक लेते है वो अक्सर मायूस नहीं होते और यही पाजिटिविटी उनके हर काम में दिखती है और धीरे धीरे यही उनका स्वाभाव बन जाता है और हम कहते है की फलां व्यक्ति हमेशा खुश खुश रहती है या फलां व्यक्ति को मेने कभी सीरियस नहीं देखा और यही स्वाभाव या आदत उनके चरित्र को बनाती है और उनके चेहरे हमे एक प्राकृतिक मुस्कान लिए दिखाई देते है |

     तो हम बात कर रहे थे आत्मविश्वाश की कि कैसे ये चरित्र निर्माण करता है और हमारे समग्र विकास के लिए किस तरह उत्तरदायी होता है और आत्मविश्वाश किस कदर हम में होना जरुरी होता है ये भी जानना आवश्यक है क्योकि यही एक है जिस से हम असंभव काम भी कर जाते है और सफलता की सीढ़ियां चढ़ते है तो आप निश्चित ही पहले ये जान लें कि दुनिया में एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं मिलेगा जिसको अपनी आत्मा में और अपने में विश्वास होते हुए भी जीवन में सुख और सफलता न मिली हो और ऐसे लोगो की कमी  नहीं है जिनके पास योग्यता और कौशल होने के बाद भी निराशा और आत्मविश्वाश की कमी के कारण कुछ भी हासिल नहीं हुआ ।

       मैं एक कहानी के जरिये इसे कहना चाहूंगा जिस से लगभग लगभग हर कोई वाकिफ है कि :- “कोलम्बस एक समान्य नाविक  था,भारत की खोज में निकला. जब वह भारत की खोज में रवाना होने को तैयार हुआ तो कोई नाविक साथ जाना नहीं चाहता था. अनजान की यात्रा में जहाँ  मृत्यु का भय और सफलता की आशा बहुत कम  थी भला कौन साथ देता? 

       राजा और रानी के दबाब पर मुश्किल से कुछ लोग तैयार हुए. बेडा रवाना हुआ महीनों बीत गए कही जमीं का कोई निशाना नहीं, उधर उसके साथी नाविक जो उसके पागलपन से खार खाए हुए थे  गुस्से में नाव तक खेना बंद कर दिया  और कोलम्बस को मार डालने तक की धमकी दे डाली ,बोले-‘यदि तुमने चूं भी की तो हथकड़ी पहना कर कर जहाज की कोठरी में डाल देगे ‘.

      बहुत  समझाने  -बुझाने के बाद नाविक कुछ और दिन तक जहाज खेने को तैयार हुआ . उस महासागर में में जहाँ चारो ओर भयानक  लहरों वाली अनंत जलराशि और गुस्साए हुए साथी थे, कोलम्बस  का सहारा उसका    विश्वास भरा  स्वप्न और उसका दृढ आत्मविश्वास था . कुछ  दूर आगे   केनराज द्वीप के २०० मील पश्चिम ,ध्रुव यंत्र बिगड़ गया ,पर कोलम्बस किसी कठिनाई के कारण अपने लक्ष्य से    नहीं भटका निरंतर वह आगे बढ़ता गया ,कुछ समय बाद आगे बढ़ने पर उसे झाड़ियों के कुछ लकडियाँ तैरती दिखाई दे गयी  और आगे आकाश में कुछ पक्षी भी उड़ते दिखाए पड़े. उसका सपना सच हो गया .

     12 अक्तूबर ,1492 को उसने एक नए दुनिया की जमीं पर अपना झंडा गाड़  ही दिया और  इस तरह भारत की खोज  में निकला कोलम्बस ने ‘अमेरिका’  खोज डाला.

       तो आप समझ सकते है कि आत्मविश्वाश के बल पर ही यानि खुद पर भरोसा कर मेहनत के मायने हम अपने लिए बदल सकते है और एक बार किसी कठिन मंज़िल को पा लेने पर हम आगे आने वाली जिंदगी की मुश्किलों के लिए खुद को तैयार कर लेते है मानसिक तौर पर जो चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हो हम उनसे पर पा लेते है यही तो मानव विकास का दूसरा चरण है एक निर्भीक चरित्र ।

  चूँकि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है. समाज की परिधि के बाहर मानव के वसन एवं विकास की कल्पना निरर्थक है. समाज मनुष्य की मूलभूत आवश्यकता है. प्रकृति ने भी समाज में रहने का अधिकार  मनुष्य मात्र को दिया है.’

     मानव के उत्थान एवं विकास के विभिन्न चरणों का अध्ययन करें तो हम पातें हैं कि जन्म के समय मनुष्य (शिशु) की पूर्ण अवलंबन की स्थिति होती है. यदि नवजात शिशु की देखभाल न की जाय तो उसकी आवर्दा कुछ घंटे या कुछ दिन हो सकती है.कालांतर में शिशु का पूर्ण विकास होता है. वह युवा होकर स्वयं को शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक एवं आर्थिक रूप से स्वतंत्र पाता है. मानव उत्थान एवं विकास का यह दूसरा चरण है ‘स्वावलंबन’ जहाँ वह स्वयं की रक्षा, जीवनयापन, आर्थिक-उपार्जन आदि की क्षमता प्राप्त तो करता ही है साथ ही ‘आत्मविश्वाशी’ भी हो जाता है.

      मैं यह कार्य स्वयं नहीं कर सकता, मुझे दूसरों की सहायता चाहिए, यह मानव विकास का प्रथम चरण है. मैं यह कार्य स्वतंत्र रूप से आत्मविश्वाश के साथ सम्पादित कर सकता हूँ, यह मानव चरित्र के विकास का द्वितीय चरण है | आत्म विश्वाश एक ऐसा शास्त्र है जिससे आप आने वाली कठनाइयो से लड़ सकते है जब तक आप में आत्मविश्वाश नहीं है तब तक आप में कुछ नहीं है | एक दृढ आत्मविश्वाश से युक्त व्यक्ति कभी नहीं रुकता और ना ही उसे रोक रोक सकता है क्योकि उसमे ताकत है विश्वाश की कि वो हर किसी से लड लेगा पर झुकेगा नहीं | वो ना आराम करेगा ना ही नींद लेगा क्योकि ये दृढ विश्वाश जो उसकी दृढ लगन से हे उसे ऐसा करने ही नहीं देगा , वो निश्चित हे उसे क्या करना हे और क्या नहीं वो खरगोश की जैसे बैठ कर आराम नहीं करेगा क्योकिउसे चैन नहीं इनसे  अगर मेने ठान ली हे लगन , तो ना मुझे नींद की चिंता हे ना ही आराम की और हर समय मुझे चिंतन हे उस लक्ष्य का जिसके लिए मेरी लगन है , ये ऐसे विचार ही दृढ विश्वाश का प्रतीक होते है |

      आत्म-विश्वास का मतलब है – अपने ऊपर विश्वास करना l आत्म-विश्वास हमारी सफलता की कुंजी है,समग्र विकास की कुंजी है और हमारे जीवन की सबसे पहली सीढ़ी है l आज के समय में अगर हमें कुछ पाना है, किसी भी क्षेत्र में कुछ कर के दिखाना है, जीवन खुशी से जीना है, तो इन सबके लिए आत्म-विश्वास का होना बहुत ज़रुरी है l आत्म-विश्वास से हमें ऐसी शक्ति मिलती है जिससे हम कुछ भी बहुत आसानी से कर सकते हैं l आत्म-विश्वास से हमारी संकल्प शक्ति को बल मिलता है l हमारी संकल्प-शक्ति से हमारी आत्मिक-शक्ति बढ़ती है और आत्मिक शक्ति से हमारे सभी कार्य संभव होते हैं l

 

selfconfidence