Home मेरी कवितायेँ लगता है पूरी जन्नत मेरी है …

लगता है पूरी जन्नत मेरी है …

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दिन भर की…
तुझसे मिलने की मेरी जिद के बाद
अब जब तुम साथ हो
और ये हसीन शाम हो ,
तेरा यूँ मुस्कुराना यूँ शरमाना
मेरा यूँ तेरे भोलेपन में बह जाना ,
तेरे जुल्फों की छाँव जैसे
गहरे बादलो की कोई आन ,
तुम्हारी ये मीठी सी आवाज
जैसे किसी मानसून का आगाज ,
तेरा यूँ जुल्फों को सवारना
मेरा यूँ तुम्हे ताकना और
तेरा बात करते करते ठहर जाना
मेरी गलतियों पे तुम्हारे ताने
लगता है जैसे पास आने के कोई बहाने ,
तुम्हारी ये नजरों की शरारतें
वक़्त से जैसे मेरे लिए हिमायते,
मेरी बेइंतिहा चाहत
तेरी बालियों की खनखनाहट
हर एक पल में तेरी आहट
और तुम्हारी साँसों की गर्माहट,
ऊपर ये फिजायें ये घटायें
हर पल मेरी बेचैनी बढ़ाये ,
अब क्यों जीना आसान करूँ
क्यों जन्नत का मैं मान करू ,
बात अब जब तेरी ही है तो
लगता है पूरी जन्नत मेरी है …

कमल अग्रवाल