Home विचार प्रवाह खाप पंचायते :एक सामाजिक अभिशाप – khaap panchayat ek samajik abhishap

खाप पंचायते :एक सामाजिक अभिशाप – khaap panchayat ek samajik abhishap

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 khaap panchayat ek samajik abhishap- लो जी करलो बात अब फिर से जब किसी और चीज़ पर बस नहीं चलता तो गाज लडकियो के कपड़ो और उनकी जीवनशेली के मुद्दे पर गिरा कर जीने की स्वतंत्रता छीन लो उनसे ,मुझे समझ में नहीं आता भई खुलकर जीने और फैसले लेने का अधिकार क्या सब मर्दों


के लिए मायने रखते है और आए दिन हरियाणा के खाप पंचायतो के ऊल जलूल फैसलों के चलते केसे संभ्य कहे जाने वाले  परिवार सभ्यता और संस्कार की &^%$ (@@डी के रख देते है और वहशीपन पर उतर आते है उदाहरण सामने है  गौरतलब है कि 18 सितंबर को रोहतक में एक प्रेमी युगल की निर्ममता से सबके सामने हत्या कर दी गई थी. 20 साल की निधि बराक को उसके ही घर वालों ने मार डाला था, उसके बाद उन्होंने 23 वर्षीय धर्मेंद्र बराक की गर्दन काटकर उसकी हत्या कर दी थी अब बतादो कारण क्या था ,कारण इतना सा था कि दोनों प्रेमी युगल एक ही गोत्र के थे…क्या ये सही था ?

निश्चित तौर पे नहीं, माना कि  हर समाज के अपनी अपनी रीति -रिवाज है अपनी परम्पराए है पर आप इस बात से मना थोड़े कर सकते है कि विवाह के लिए साथी चुनना निजी स्वतंत्रता का मामला है और ये कोई अभिशाप नहीं नहीं है ऐसे में अगर किसी समुदाय  विशेष में अगर ये अस्वीकार्य है तो समुदाय  के प्रतिनिधिओ को चाहिए कि वो आपस में बैठकर वार्तालाप के माद्यम से इसका विकल्प तलाशे या फिर अगर समुदाय विशेष को लगता है कि ये भी जायज नहीं है तो अगर समुदाय चाहे तो अपनी झूटी शान के लिए उनसे भविष्य में कोई रिश्ता न रखे पर निर्मम तरीके से किसी की हत्या करना कोई सही हल थोड़े है और न ही हमे किसी ने हक दिया है इस अपराध के लिए……….

लेकिन फिर भी बदस्तूर सिलसिला जारी है आए दिन पेपर में और मीडिया के माध्यम से हम ऐसी घटनाओ को सुनते है और मानसिक द्वंद्व चलता रहता है  और मन में सवाल उठता है तो क्या सभ्य समाज और सदाचार की परिभाषाये बस परिकल्पनाए मात्र है क्या हमे यंही आना था ??

क्योकि जिस बात का बैठके हल किया जा सकता था उसी बात के लिए लड़की के परिवार वाले अपनी झूटी शान को बचाने  के चक्कर में २ जिन्दगी बर्बाद करदी और खुद अब जेल के सलाखों के पीछे रहेंगे तो शान तो गयी न और मान लो जेल नहीं भी होती तो क्या अचार डालते अपनी ऐसी शान का ,क्या खुद के बेटे बेटियो को मारके अपने आप को माफ़ कर पाते  ?

अब देखो दूषित और कचरा हो चुके संक्रमित विचारो की उच्चतम पराकाष्ठा, बारह बिरोहर खाप के वाइस प्रेसिडेंट राजेंद्र सिंह ने ‘द हिंदू’ अखबार से कहा, ‘हमारा मानना है कि महिलाओं को सिर से लेकर पांव तक ढीले-ढाले कपड़ों में ढके रहना चाहिए, जिससे पुरुष उन्हें देखकर आकर्षित न हों. हमारा विचार है कि महिलाओं की खूबसूरती तब है जब केवल उनके हाथ ही दिखे. उनकी आंखें भी पर्दों में रहनी चाहिए.’ इतना ही नहीं कुछ लोगों को कॉलेज जाने वाली लड़कियों पर नजर रखने के लिए भी कहा गया है.10 साल से ऊपर की लड़कियों को सलवार-कमीज की पहनने की हिदायत दी गई है, खबरों के मुताबिक उन्हें जीन्स और टी-शर्ट पहनने की इजाजत नहीं है ।

इस घटिया स्टेटमेंट पर मैं कहना चाहूँगा कि इतने सारे फतवे और ज्यादती और निजी जिंदगी में इतने हस्तक्षेप के बावजूद भी जिन कारणों का हवाला देके ये खाप पंचायते पंचायते अपना अस्तित्व बचाए हुए है उनमे तो जरा भी सुधार देखने को नहीं है क्योकि आपको बताऊ शहरों से ज्यादा बलात्कार तो गाँवो में होते है ,पर इन्ही खापो की वजह से सामने नहीं आ पाते और लड़की के साथ अन्याय होता है  और दोषी बच जाता है |

मुझे समझ नहीं आता कि इन पंचायतो को ये समझ क्यों नहीं आता दोष तो देखने के  नजरिये का है आप वो बदलो बलात्कार जेसे कुकर्म अपने आप कम हो जाएगी बलात्कार जेसी घटनाओ के लिए लडकियो को उनके पहनावे के लिए दोष देने की कंहा जरुरत है एंड कुछ बदलना है तो तो कुछ क्रांतिकारी बदलो  लडकियो की सुरक्षा के नाम पर उनकी आजादी क्यों छीनते हो क्योकि अगर हस्यास्पद फतवे ही जारी करने है तो ये जारी करो की मर्द भी पर्दे में रहे अहसास होगा कितनी बंदिश महसूस होती है  और आखिर लोकतांत्रिक सभ्य समाज में निजी स्वतंत्रता से बढ़ कर कुछ नहीं है तो फिर ये आलतू फालतू के फतवे क्यों ??

हर किसी को अपनी जिन्दगी अपने तरीके से जीने का अधिकार है और मुस्लिम बहुतायत कई देशो में महिलाओ की दुर्गति देखी ही है आपने ? तो ये खाप पंचायते क्या वही पुराने हालत वापस ला  देना चाहती है जब महिलाओ को पैर की जूती समझा जाता था और अगर बात अंतरजातीय या फिर गोत्र में ही विवाह की तो जेसा मेने पहले कहा यह बड़ा जटिल विषय
है. लोकतांत्रिक सभ्य समाज में निजी स्वतंत्रता से बढ़ कर कुछ नहीं है. यदि दो व्यक्ति लिंग,

धर्म, जाति या गोत्र सम्बंधित सामाजिक मान्यताओं को ठुकरा कर विवाह करते हैं या यौन सम्बन्ध बनाते हैं तो इसमें किसी को दखल देने का अधिकार नहीं. वो दूसरों को वैसा ही करने को मजबूर तो कर नहीं रहे हैं. जो अंतर्गोत्रीय विवाह करना चाहे वो करें, जो अंतरागोत्रीय विवाह करना चाहे वो भी स्वतंत्र हैं. सामाजिक मूल्य और मान्यताएँ थोपे नहीं जा सकते,

और फिर आप कहते है कि ऐसा करना कौटुम्बिक व्यभिचार में आता है तो कहना चाहूँगा समान गोत्र में कोई कारणवश कोई शादी कर भी लेता है तो कौन सा आसमान टूट पडता है? दुनिया में अनेक जातिओ में पित्राई रिश्तो में शादियां होती है तो क्यां उसका वंश बरबाद हो गया? खाप पंचायतों की बातों का कोई वैज्ञानिक आधार नही है. सिर्फ रिवाज और रुढी के नाम पर ऐसी बरबरता को वढावा नही मिलना चाहिए. एसे में तो कई पुराने रिवाज फिर से शुरु हो जने का खतरा है.  जिन्हें हम कुरीतियों के नाम पर पीछे छोड़ आये  है है इन्ही खाप जेसी घटिया चीजों से लड़कर………

ये वो लोग हैं जो भारत को धकेल रहे हैं- उसी रास्ते पर जैसे पाकिस्तान में होता है. पाकिस्तान में ऐसे मौत के फरमान जारी होते हैं लेकिन भारतीय समाज में इसकी कोई जगह नहीं है माना कि समान गोत्र में शादी परंपराओं के अनुसार विरुद्ध है लेकिन कानूनी तौर पर इसमें कोई परेशानी नहीं है. इसलिए खाप पंचायत का फतवा एक ‘संगठित अपराध’ है. इस तरह के ‘समाजिक आतंकवाद’ का अंत होना चाहिए और इसे रोकने के लिए सख़्त क़ानून बनाने की ज़रूरत है. और फिर आज़ादी के 63 साल बाद भी इस तरह की पंचायतें होना शर्म की बात है. भारत में कोई भी संविधान से ऊपर नहीं है. खाप पंचायतों को इसका अधिकार नहीं है कि वो शादी-विवाह के बारे में बताएं. भारत सरकार को कड़े क़दम उठाते हुए लडकियो की आजादी विरोधी  इन पंचायतों को बंद कर देना चाहिए.|

जाते जाते कहना चाहूँगा जितने भी खाप पंचायतो के अनुचित फैसलों में दोषी है सबको तालिबान के एक आतंकवादी मानके  के तहत मुकदमा चलाया जाना चाहिए और खाप  पंचायतो को घरेलू तालिबान के समकक्ष दोषी करार दे देना चाहिए  |

KK

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