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Know Sarvepalli Radhakrishnan in hindi- सर्वपल्ली राधाकृष्ण का बचपन

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Sarvepalli Radhakrishnan in hindi – डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन भारत के दूसरे राष्ट्रपति के तौर पर हम जिन्हें जानते है वो अपने विद्यार्थी जीवन में भी बड़ी प्रतिभा के धनी थे और इस बात का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि बचपन में उनके पिता जो उनको स्कूल नहीं भेजना चाहते थे क्योंकि वो उन्हें पंडित बनाना चाहते थे  उन्होंने भी उनकी प्रतिभा को देखते हुए उन्हें स्कूल भेजने का निर्णय  ले लिया |

Sarvepalli Radhakrishnan in hindi
Sarvepalli Radhakrishnan in hindi

 

लोग अक्सर अपने बचपन के बारे में शिकायत करते है और कहते है कि सही अवसर होते तो आज शायद माहौल कुछ अलग होता या वो किसी अच्छी पोस्ट पर होते लेकिन अगर आप गौर से देखें सफल लोगो को अधिक अवसर नहीं मिलते बस वो अपने सपने के लिए कुछ अधिक सचेत होते है और लक्ष्य के लिए मेहनत करते है यही सर्वपल्ली के साथ भी था उनके परिवार में भी गरीबी इतनी थी कि खाने के लिए बर्तन नहीं थे घर में और पूरा परिवार केले के पत्तो पर ही भोजन किया करता था और एक बार तो ऐसा हुआ कि घर में केले के पत्ते खरीदने के लिए पैसे नहीं थे इसलिए उन्होंने नीचे ही जमीन को साफ़ करके खाना खा लिया था | मैंने इस बारे में अधिक नहीं पढ़ा है लेकिन ऐसा लगता है ऐसा उन्होंने कई बार किया होगा |

अगर शुरू के दिनों की बात करें तो आपको बता दे वो केवल 17 रूपये कमाते थे और उनके परिवार में उनकी पांच बेटियां और एक बेटा था जबकि परिवार की जरूरतों के चलते उन्होंने कुछ पैसे उधार भी लिए जो कि समय पर नहीं लौटने के कारण उन्हें अपने मैडल तक बेचने पड़े | और जब वो देश के राष्ट्रपति बने तो उन्हें 10000 रूपये तनख्वाह के रूप में मिलती थी जो उस समय बहुत थी लेकिन इसके बाद भी वो केवल 2500 रूपये मासिक ही स्वीकार करते थे और बाकि पेसे वो प्रधानमंत्री आपदा कोष में जमा करवा देते थे |

सोचिये आज के जमाने में क्या कोई अपने देश या देश के लोगो के भले के लिए ऐसा कर सकता है असल में जो राजनीती ने आते है कुछ समय पहले तक उनके पास कुछ नहीं होता है लेकिन थोड़े ही समय के बाद उनके घर में राजसी ठाट हो जाते है और घमंड इतना अधिक कि आसमान में नहीं समायें | ये कहानी जब मेने पढ़ी थी तो मुझे खुद को इस घटना को सहज स्वीकार करने में परेशानी हुई थी कि क्या सच में ऐसा हुआ होगा मेरा मतलब इतने ईमानदार और निष्ठावान लोग भी रहे होंगे ? वो भी इसी भारत में लेकिन थे इसमें कोई शक नहीं है क्योंकि उन्ही के चलते हम आज है नहीं तो अगर आज के परिपेक्ष्य में नेता हुए होते शुरूआती दौर में तो शायद मैं कंही न कंही मजदूरी ही कर रहा होता या फिर किसी देश के अधीन होते |खैर यही निष्ठा थी तो आज भी हम उन्हें याद कर रहे होते है इसी निष्ठा और देशभक्ति ने उन्हे इतना सम्मानीय बनाया है और उनका जन्म दिवस आज हम “राष्ट्रीय शिक्षक दिवस ” के रूप में मनाते है |

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