Home मेरी कवितायेँ जो लबों पे ये मुस्कुराहट सी है…

जो लबों पे ये मुस्कुराहट सी है…

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अमूमन सुबह उठते ही सबसे पहले मुझे उसी का ख्याल आता है और मेरे अपने बनाये रिश्तों में वो पहली है जिसके साथ से मुझे कभी कोई शिकायत नहीं रही और जाहिर है मैं इसे कभी खोना नहीं चाहूंगा लेकिन संभावनाएं आप ही के पक्ष में हो ऐसा हमेशा जरुरी नहीं और यही वो है जो एक सर्द सुबह को मैंने अपने शब्दों में कुछ ऐसे लिखा है :-

आज की सुबह में कुछ सुगबुगाहट सी है
घने कोहरे में जैसे मैं ही नितांत अकेला ,
अधखुली आँखे अलसाया सा तुझमे डूबा
हवा के झोंको में कुछ मद्धिम सरसराहट सी है,
बीतते हर पल में मेरे एक अनजाना डर
तुझे खो देने का तुझसे दूर होने का पर
आने वाले हर लम्हे में तेरी आहट सी है,
कल रात की बातों ने मुझे सोने न दिया
कहने लगी यही थोड़ा वक़्त है साथ का
भूले से जब हमारे कल का सोचती हूँ
सच कंहू तो होती मुझे भी घबराहट सी है ,
न तुम मानोगे न पापा से जिद पाउंगी
अलग उलझन है ये प्रेम समर की
मेरे मन में अजीब कसमसाहट सी है ,
चाहती हूँ मायने हो मेरी चाहत के भी
जानते हो बिछड़ने से मैं भी डरती हूँ
तो ही शब्दों में ये लड़खड़ाहट सी है ,
तुम्हारे पास मैं तो हूँ जो मुझे कहदो
मैं अपना हाल किस से जाहिर करू
मन की ये जो झनझनाहट सी है ,
रात गहरी हो गयी अब सो जाओ
ये तुम ही तो हो ‘कमल’ मुझमे
जो लबों पे ये मुस्कुराहट सी है…”

कमल अग्रवाल