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क्या हम हमेशा गलत होतें है ? -Lack of joy in life in hindi

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Lack of joy in life – मुझे नहीं पता इस पोस्ट का title क्या होना चाहिए पर मेरे मन में अभी कुछ चल रहा था तो अपनी बात कहने के लिए सोचा कुछ तो title दे ही देता हूँ और अगर आपको अच्छा title पोस्ट पढने के बाद दिमाग में आये तो जरुर सुझा दें | दरअसल दोपहर में मुझे पता चला पड़ोस में रहने वाली एक बुजुर्ग महिला नहीं रही | कुछ भी असामान्य नहीं था क्योंकि आज के दौर में अगर हम बात करें दुखद वो घटना होती है जब बहुत सी जिम्मेदारियों का निर्वाहन बाकी हो और कम उम्र में सांसे साथ छोड़ दे जिसे हम जिन्दगी का असमय अंत मानते है क्योंकि उसके बाद उस इन्सान पर निर्भर बाकी के लोगो के लिए उसकी कमी को भर पाना बेहद मुश्किल होता है | यंहा तो एक बुजुर्ग महिला की बात थी सो मैंने ignore कर दिया लेकिन पल भर बाद ही एक वाकया याद आ गया जिसके चलते मैं कुछ सोचने पर मजबूर हो गया |

Lack of joy in life
Lack of joy in life

 

वो एक गाँव से belong करती थी और कुछ थोड़े साल पहले ही वो लोग मेरे पड़ोस में शिफ्ट हुए थे लेकिन इसके बाद भी उनकी कुछ पुरानी सोच के चलते मैंने उन्हें हमेशा एक खडूस महिला ही माना है क्योंकि ज्यादा नहीं मैं एक बार उनके घर किसी काम से गया हूँ तो देखा है कि इतनी बुजुर्ग होने के बाद भी पूरे घर का control उनके हाथ में था और जब वो अपने हाथ से खाना नहीं परोस देती पूरे घर में किसी को खाने की इजाजत नहीं थी और इसकी वजह उनके लिए सम्मान नहीं था क्योंकि होता तो वो घरवालों के चेहरों के उल्लास में दिख जाता है और फिर अगर वो चाहती तो आराम से इन सारी जिम्मेदारियों से retirement भी ले सकती थी और सबसे ज्यादा फजीहत थी उनकी बहुओं को जबकि मैंने आधुनिक जमाने में शायद ही जन्हा मैं कभी कंही गया हूँ जन्हा ऐसा माहौल देखा हो घर में बच्चो से लेकर बडो तक अगर किसी को भी कुछ सामान खरीदने या किताबे तक लेने के लिए पैसो की आवश्यकता होती उन्हें उस बुजुर्ग महिला को interview देना होता | बहुओं को बाहर जाने की इजाजत नहीं थी फिर खरीददारी की तो बात ही दूर है जबकि उनके पति जो शायद ही कभी उनका पक्ष सुनते हो या अपनी पत्नियों की परेशानियों से उन्हें फर्क पड़ता हो वो जो उनके लिए कपडे ले आते उसमे पसंद या नापसंद होने का सवाल ही नहीं होता था | ऐसी बहुत सी बाते है जो शायद शब्दों से बेहतर अगर आप उन्हे उसी माहौल में महसूस करके देखें तो बेहतर समझ पायें |

आज जब मैं उनके घर पापा के साथ उनके क्रियाकर्म पर गया तो मैंने पाया कि घर के किसी सदस्य के चेहरे पर कोई शिकन के भाव नहीं है और न ही कोई मुझे शोकाकुल नजर आया | हाँ थोडा रोना धोना मैंने देखा लेकिन उसके बाद भी किसी इन्सान के चले जाने पर उसके लिए तो व्याकुलता या पीड़ा किसी की आँखों में होती है वो मैंने कंही नहीं देखी | मैं सोचने लगा कि आखिर कंहा कमी है जो इतने बरस समाज और अपने परिवार के लिए जिन्दगी समर्पित कर देने वाला एक इन्सान जिसकी किसी को कमी महसूस नहीं हो रही | कौनसी वजह है जो एक इन्सान अपनी जिन्दगी के 80 बरस देने के बाद भी अपनी इतनी भी कीमत नहीं बना पाया कि उसके चले जाने के बाद किसी को उसकी कमी महसूस हो |

मैंने पाया वो है एक पर्याप्त भरोसा जो हम अगर किसी पर नहीं करते है तो हमे वो कभी return में नहीं मिलता जिसके हम योग्य होतें है और यही उनके साथ भी परिवार में बहुएं थी अन्य लोग भी थे जो पूरे परिवार के मैनेजमेंट को देख सकते थे लेकिन फिर भी उन बुजुर्ग महिला ने अपनी बहुयों या बेटों पर कभी वो भरोसा नहीं दिखाया जो उनकी नज़रों में उनकी कीमत बढ़ा पाता और चूँकि वो जब चलने फिरने में भी पहले जितनी समर्थ नहीं थी तो उन्हें चाहिए था कि वो अपनी जिम्मेदारियां अपने आगे वाली पीढ़ी को सौंप देती | उन्हें लगता था कि नहीं ! मुझे अधिक चीजों को कोई मैनेज नहीं कर सकता है इसलिए बेहतर है यह काम भी मैं ही करूं फिर चाहे productivity हो या नहीं हो क्योंकि जो समय उन्होंने ने जिया है और आगे आने वाली Generation में जो आधुनिकता है उसमे इतना बड़ा Gap है कि अधुनिकता की जरूरतों को देखते हुए  उनके लिए ये Gap तय कर पाना थोडा मुश्किल था और यही वजह थी कि परिवार में उनके लिए कोई खास सम्मान नहीं था क्योंकि जरूरत की चीजों के लिए भी उन्हें उन महिला को लॉजिक देना होता जो उन्हें संतुष्ट करने के लिए हमेशा अपर्याप्त होता इसलिए केवल बुजुर्ग होने के नाते उनकी हर एक बात मानी जाती और ये सहन करने की हद तक था इसलिए आज जब वो नही रही तो किसी ने उनके चले जाने पर रोने की बजाय अपनी अपनी स्वतंत्रता का अधिक ख्याल किया | इसलिए ये बेहतर होता अगर वो समय पर अपनी जिम्मेदारियों से retirement ले लेती तो बिना किसी चिंता के अपनी जिन्दगी उसी स्वछंदता के साथ जी पाती जो किसी भी व्यक्ति को अपने जरा काल में आदर्श स्थितियों में परिभाषित है | क्योंकि जंहा परिवार वाले उनकी ख़ुशी के लिए अपनी मर्जी के बिना भी उनके हर आदेश की पालना करने में खुद की खुशियाँ ताक पर रख सकते है वंहा अगर वो उनकी खुशियों की वजह होती तो ये अधिक सकून भरा होता ,वो उनके लिए क्या नहीं करते ?

मैं किसी से इस बारे में  Discuss कर ही रहा था कि किसी ने पूछा क्या वो या उनके परिवार वाले चाहते तो ये बदल सकते थे मैंने कहा हाँ अगर चाहते तो लेकिन किसी ने ये जहमत ही नहीं उठायीं |

फिर उसने पूछा “इसमें कौन कंहा गलत है ?”

मैंने कहा ” स्वाभाविक तौर पर किसी से सहानुभूति नहीं रखे तो बेशक उनकी बहुओं की प्रथम गलती है |” क्योंकि जंहा अगर कोई इन्सान अपनी स्वतंत्रता या सवंछ्न्द्ता के लिए कुछ बदलने की जहमत नहीं उठता तो मेरे ख्याल ये वो कुछ deserve ही नहीं करते क्योंकि अगर वो चाहती तो थोड़ी मुश्किल शुरुआत के साथ अपने लिए चीज़े बदल सकती थी और Generation Gap को अपनी सूझबूझ से बदल सकती थी जबकि उन्हें लगा होगा ऐसा संभव नहीं है इसलिए पारिवारिक कलह से बचने के लिए उन्होंने चुप रहने का वैकल्पिक रास्ता चुना जो एक तरह से बेवकूफी ही है क्योंकि यह भी दकियानूसी सोच की तरह ही है और जब तक हम अपनी सोच नहीं बदल सकते ये भी fact है कि हम कुछ नहीं बदल सकते और यही कारण है कि उन बुजुर्ग महिला के साथ साथ उन्होंने भी अपनी जिन्दगी का एक बड़ा हिस्सा भी दासता जैसी हालत में गुजार दी ” वजह ये कि उन्होंने जो हालात थे अच्छे बुरे बस अपने moral values के ढकोसले के नीचे दबकर उन्हें सहज स्वीकार किया और पारिवारिक सोच को बदलने में कोई मेहनत ही नहीं की | एक स्त्री चाहे तो क्या नहीं बदल सकती ?

और हाँ हम गलत होते है , हम तब भी गलत है जब हम कोई गलत फैसले लेते है और तब भी जब जब हम दूसरो के थोपे हुए सहते है क्योंकि किसी भी परिवार में सबकी सोच एक जैसी नहीं होती है लेकिन हम जब अपने लिए सही तरीके से चीज़े बदलते है तो हम उस व्यक्ति के लिए भी बहुत कुछ करते है जिसे बदलना मुश्किल हो | क्योंकि आखिर परिवार को सही मायनो में  ‘परिवार’ बनाना भी तो एक कला है और ये किसी स्त्री से बेहतर कोई नहीं जानता और न ही उसके लिए मुश्किल है |

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