Home मेरी कवितायेँ ऑफिस से आज थोड़ा लेट हो गया ..

ऑफिस से आज थोड़ा लेट हो गया ..

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मुझे ठीक ठीक नहीं पता मुझे ये लिखने की प्रेरणा कहां से मिली लेकिन मेरे जानने वालों में से किसी एक की ये कहानी है जिसे मैंने अपने शब्द दिए है कुछ इस तरह कि :

“आज ऑफिस से थोड़ा लेट हो गया
सोचा एक अरसे से हूँ भीड़ में खोया
कुछ खुद संग चलू तो पैदल ही हो लिया ,
भागती जिंदगियां जब मैं देखता तो
सोचता था इतनी भी क्या बंदिशे है
और क्या है जो भाग के भी पा लिया ,
बचपन बीता मेरा उन्ही तंग गलियारों में
जवानी आधे अधूरे से प्यार में निकली
और फिर मालूम ही न पड़ा जाने कब मैं
इसी ‘भीड़ का हिस्सा’ हो गया ,
विचारो की उधेड़बुन में उलझा
गलियों से गुजरते खम्बे गिनते
मैं कंही दूर अनजाने में खो गया,
फिर एक अपनी ही दुनिया में मग्न
आलिंगनबद्ध प्रेमी जोड़े ने मेरा ध्यान खींचा
सहसा ही मैं बीते दिनों में लौट गया ,
ये ऐसा ही था जैसे निरंतर साथ का वादा
पल भर उनकी ख़ुशी को जिया फिर
बीता हुआ एक तूफ़ान लौट गया ,
वो भी तो कहती थी मुश्किलें साथ झेलेंगे
यही वो था वही एक ‘वादा’ जो
बिछड़ने का दर्द ‘नासूर’ बन गया ,
बेअक्ल लोग यही कहते रहे
कि ‘कमल’ पागल हो गया ,
सहसा फ़ोन बजा तो तन्द्रा टूटी
तो मालूम पड़ा घर आ भी गया ,
पत्नी कहने लगी कहां खोये हो क्या हुआ
जल्दी आ जाया करो कितना अँधेरा हो गया,
मैंने कहा कुछ नहीं काम ज्यादा था तो
ऑफिस से आज थोड़ा लेट हो गया …”

कमल अग्रवाल