Home विचार प्रवाह सम्राट मिलिंद और भिक्षु नागसेन की कहानी -Osho vichar in hindi

सम्राट मिलिंद और भिक्षु नागसेन की कहानी -Osho vichar in hindi

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osho vichar in hindi – एक भिक्षु नागसेन को राजा मिलिंद ने निमंत्रण भेजा तो जो राजदूत गया था निमंत्रण देने उसने जाकर भिक्षु से कहा कि “भिक्षु नागसेन आपको बुलाया है सम्राट ने ” तो नागसेन ने कहा कि मैं निमंत्रण तो स्वीकार करता हूँ और चलूँगा भी जरुर लेकिन ये जान लो कि “भिक्षु नागसेन तो कोई है ही नहीं ” यह तो बस एक कामचलाऊ नाम है | राजा ने बुलावा भेजा है तो मैं चलूँगा तो अवश्य लेकिन इस नाम का यंहा कोई नहीं है | तो राजदूत ने आकार राजा से कहा कि बड़ा पागल आदमी है कहता है मैं मैं आऊंगा तो अवश्य पर इस नाम का कोई यंहा है ही नहीं |

थोड़ी देर बाद नागसेन रथ पर बैठकर आया तो राजा ने द्वार पर स्वागत किया कि भिक्षु नागसेन हम आपका अभिवादन करते है इस पर नागसेन हंसने लगा और कहा कि महाराज अभिवादन तो स्वीकार है लेकिन याद रहे इस नाम का कोई व्यक्ति है ही नहीं | राजा कहने लगा आप भी बड़ी अजीब बात करते है अगर इस नाम का कोई है ही नहीं तो फिर कौन आया है यंहा कौन है जो अभिवादन स्वीकार कर रहा है और कौन है जो मुझसे वार्तालाप कर रहा है |

इस पर भिक्षु ने राजा से कहा – ये सामने रथ है जिस पर मैं आया हूँ तो उस से अगर घोड़े निकल लिए जाएँ तो क्या ये घोड़े रथ है ? राजा ने कहा घोड़े रथ केसे हो सकते है तो उसके बाद घोड़े जिस डंडो से बंधे है क्या ये रथ है तो राजा ने कहा नहीं ये रथ कैसे हो सकते है | ऐसे करके भिक्षु ने एक एक करके रथ के सारे अवयवो को बाहर निकाल कर कहा कि क्या ये रथ है राजा ने कहा -नहीं | तो अंत: में कुछ भी नहीं बचा इस पर भिक्षु ने राजा को कहा देखिये रथ तो कुछ है ही नहीं ये तो बस कुछ अवयवो का मिश्रण है जबकि असल में रथ कुछ है भी नहीं इसी तरह मैं भी नागसेन नहीं हूँ और इस नाम का कोई है भी नहीं |

आप खुद तो थोडा गहराई से देखे तो पाएंगे असल में जिस ‘मैं’ के साथ आप खुद को उपलब्ध करते है वो असल में कुछ है ही नहीं |