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असली सेवा और पुण्य – Real service and virtue hindi short story

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virtue hindi short story – एक बार गुजरात की एक रियासत की राजमाता मिलन देवी ने भगवान् सोमनाथ का विधिवत अभिषेक किया |उन्होंने सोने का तुला दान कर उसे सोमनाथ जी को अर्पिता कर दिया | लेकिन यह करने के बाद उसका मन अहंकार से भर गया कि आज तक किसी ने भी बहुमूल्य सोने का दान नहीं किया | ऐसा कर चुकने के बाद वो आपस अपने महल में आ गयी | रात को जब वो सोने गयी तो भगवान सोमनाथ उसके सपने में आये और उस से बोला कि मेरे मंदिर में एक गरीब महिला आई है | उसके संचित पुण्य असीमित है उनमे से कुछ पुण्य तुम स्वर्ण मुद्राएँ देकर खरीद लो तुम्हारे परलोक में काम आएंगे |

नींद टूटते ही राजमाता बेचेन हो उठी और उसने अपने राजभवन के कर्मचारियों को आदेश दिया कि उस मंदिर से महिला को लेकर आओ |कर्मचारी मंदिर पहुंचे और उस महिला को पकड़कर ले आयें | महिला थर थर कांप रही थी क्योंकि उसे राजभवन में सैनिको द्वारा अचानक लाये जाने का प्रयोजन मालूम नहीं था |

राजमाता ने उस महिला से कहा कि ‘तुम अपने संचित पुण्य में से कुछ हमे देदो बदले में हम तुम्हे जितनी तुम चाहो तुम्हे स्वर्ण मुद्राएँ भेंट करेंगे |’ राजमाता की बात सुनकर गरीब महिला बोली ‘महारानी जी मुझ गरीब से भला पुण्य के कार्य कैसे हो सकते है मैं तो दर दर भटक कर भीख मांगती हूँ और कल जब मुझे भीख मिली तो मैंने सोचा सोमनाथ जी के दर्शन कर और उन्हें भी भोग लगा दू इस पर रस्ते में एक भिखारी मिला जो भूखा था तो आधा सत्तू मेने उसे दे दिया और बाकि सत्तू मेने सोमनाथ जी को भोग लगा दिया |” जब मैं भगवान् को ठीक से प्रसाद भी नहीं चढ़ा पायी तो भला पुण्य कैसे अर्जन होगा ?

गरीब महिला की बात सुनकर राजमाता का अहंकार नष्ट हो गया क्योंकि अब वो समझ चुकी थी कि निस्वार्थ समर्पण की भावना से प्रसन्न होकर भगवान ने उसे असीमित पुण्य दिया है | इसके बाद राजमाता समझ गयी कि दीन दुखियों की सेवा ही असली सेवा है | उसी में भगवान् प्रसन होते है |