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धार्मिक पत्नी – religious wife atheist husband a story

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Religious wife atheist husband – एक दिन एक आदमी साधू के यंहा गया और उस से अपनी समस्या रखी कि महाराज मेरी पत्नी जरा भी धार्मिक नहीं है पूजा पाठ के कामो में जरा भी ध्यान नहीं देती है अगर आप उसे थोडा समझा देते है तो उसे थोडा बोध हो जायेगा और हो सकता है वो धर्म कर्म के कामों में अपना मन लगा ले|

इस पर साधू ने कहा चलो ठीक है मैं कल सुबह ही तुम्हारे घर आऊंगा | अगले दिन साधू जब उस व्यक्ति के घर पहुंचा तो घर के काम काज में व्यस्त उसकी पत्नी से पुछा कि बेटी तुम्हारे पति कंही दिखाई नहीं दे रहे है तो इस पर उसकी पत्नी ने कहा कि महाराज वो चर्मकार की दुकान पर गये है इस पर अंदर माला फेर रहा उसका पति उठकर आया क्योंकि उसने पत्नी की बात सुनी और उस से झूट सहा नहीं गया  और बोला कि तुम झूट क्यों बोल रही हो मैं अंदर था जबकि तुम्हे तो पता भी इसके बाद भी तुम साधू से झूट बोल रही हो |

साधू हेरान रह गया और उसकी पत्नी ने बोला कि आप चर्मकार की दुकान पर ही थे आपका शरीर पूजाघर में और माला हाथ में थी लेकिन फिर भी आपका मन चर्मकार की दुकान में ही था और आप उसके साथ बहस कर रहे थे पति हो होश आया | पत्नी ठीक ही कह रही थी माला फेरते फेरते वह चर्मकार की दुकान पर चला गया था क्योंकि उसने कल ही जो जूते लिये थे वो खराब निकल गये थे इसलिए सोच रहा था की क्या क्या खरी खोटी दुकानदार को सुनानी है और इसलिए वह मन ही मन उस चर्मकार से बहस कर रहा था |

पत्नी जानती थी कि उसका ध्यान कितना मग्न रहता है और रात में वो जूतों के लिए जिस तरह शिकायत कर रहा था और सुबह सुबह ही जूते बदलवा लेने की उसकी इच्छा पत्नी से छुप नहीं पायी इसलिए वो सब जानती थी जबकि पत्नी की साधना कमाल की थी उसने साधना के महत्व को आत्मसात कर लिया था इसलिए साधू ने उस देवी को प्रणाम कर वंहा से विदा ली |