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अहंकार की मूर्ति – Statue of ego Hindi Story

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Statue of ego  – एक मूर्तिकार था जो बहुत अच्छी मूर्तियाँ बनाता था और उसकी मूर्तियाँ भी बहुत अच्छे दामों पर बिकती थी | समय के साथ उसका बेटा भी बड़ा हो गया तो उसने वही हुनर अपने बेटे को भी सिखा दिया और दोनों बाप बेटे मूर्तियाँ बनाने लगे और शाम को बाजार में जाकर उनको बेच आते इस तरह उनका गुजरा चलता | थोड़े दिनों में ही बेटे की मेहनत और लगन रंग लायी और उसके बाद उसकी मूर्तियाँ अपने पिता की मूर्तियों से अधिक दामों पर बिकने लगी |

एक दिन मूर्तिकार का बेटा रोज की तरह मूर्तियाँ बना रहा था तो उसके पिता ने जाकर अपने बेटे को मूर्ति के अंदर रह जाने वाली कमियों को बताया तो बार बार कमियां बताने पर मूर्तिकार का बेटा खीज गया और क्रोध में आकर कहने लगा कि पिताजी अगर मेरी मूर्तियों में इतनी ही कमी होती तो आपसे अधिक दाम पर कभी नहीं बिकती |

मूर्तिकार ने कुछ नहीं कहा और अंदर जाकर सो गया  तो थोड़े देर बाद उसके बेटे को अहसास हुआ कि उसे अपने पिता से ऐसे बात नहीं करनी चाहिए थी इस पर उसका बेटा अंदर गया और अपने पिता के पेरो के पास बैठकर उस से माफ़ी मांगी इस पर मूर्तिकार ने बड़े प्यार से समझाया कि बेटा जब मैं तुम्हारी उम्र का था तो मुझे भी अहंकार हो गया था कि मैं सबसे अच्छी मूर्तियाँ बनाता हूँ क्योंकि मेरे पिता की एक मूर्ति पांच रूपये में बिकती थी जबकि मेरी वाली पांच सौ में और इसके बाद देखो मैं कभी इस से अच्छे दाम पर अपनी मूर्तियाँ नहीं बेच पाया | क्योंकि अहंकार के आ जाने पर हम सीखना बंद कर देते है और मैं नहीं चाहता कि जो नुकसान मेरा हुआ वो तुम्हारा भी हो इसलिए मेने तुमसे ये कह दिया और फिर इन्सान तो जीवन भर सीखता ही रहता है फिर घमंड किस बात का |

मूर्तिकार के बेटे को अपनी गलती का अहसास हुआ और उसने भविष्य के लिए अपने पिता को अपनी मूर्तियों में कमियां बताने का आग्रह किया |