Home विचार प्रवाह विचित्र संस्कृति और संस्कारी गधे – vichar parwah in hindi

विचित्र संस्कृति और संस्कारी गधे – vichar parwah in hindi

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    vichar parwah in hindi – कितनी अजीब बात है लोग धारणाओ को मानवता से ऊपर मानके चलते है तभी तो ये ऐसी मन में बसी है इतनी कि इनमे कुछ भी घटाना सम्भव सा नहीं जान पड़ता हाँ आप देवी देवताओ के नाम पर इनमे कुछ भी आडम्बर और जोड़ दो तो निश्चित ही  इसमें कोई बुराई नहीं दिखलाई देती लोगो को …इतना अँधा अनुकरण किसलिए…. मेरी समझ के तो बाहर है क्या ये वाकई ईश्वर की और से है मेरे ख्याल से निश्चित तौर पर नहीं क्योकि समाज के कुछ अगुओं ने उस दौर की मानसिकता को ध्यान में रखते हुए अपने लाभ के लिए (पंडो की फ़ौज आज भी यही कर रही है ) कुछ लकीरे खींच दी कुछ झूटी मर्यादाएं और कुछ जटिल मान्यताये जो आज भी दौर और समझ के बढ़ने बदलने के बाद भी और इतनी विकसित हो जाने के बावजूद हम ढोये जा रहे है आखिर क्यों ??

  जाहिर सी बात है आपको भी नहीं पता… और जब नहीं पता तो होना ये चाहिए कि हमे इसे छोड़ देना चाहिए लेकिन नहीं उसके लिए भी कोई सही सी वजह नहीं जान पड़ती.. क्योकि इसमें भी एक डर है एक फुद्दू सा डर प्रकोप की झूटी सम्भावना का जभी तो आपको इनके मानने के पीछे के कारण जानने से भी डर लगता है और यही वजह कि आप ढोये जा रहे है एक बोझ संस्कृति के नाम पर झूठा और आधाररहित  ।
आप खुद देखिये कितनी विचित्र संस्कृति है कि प्रतीक मानकर लिंग और योनि की पूजा करेंगे, उसे धो धो के पियेंगे परन्तु यदि बेटा बेटी ने सेक्स कर लिया जो कि स्वाभाविक भूख है शरीर की तो उन्हें काट कर फेंक देंगे और मरने मारने पर उतारू हो जायेंगे! और अब अगर आप नैतिकता को बीचे में घुसेड़े तो मैं बता दू जाहिर सी बात है आप अगर इसी चीज़ के लिए अपने बेटे बेटियो को उनकी जिंदगी में स्पेस नहीं देंगे तो अनैतिकता तो होगी ही क्योकि ये तो प्रकृति प्रदत है और इसे होना ही है आप जगह देंगे तो नैतिकता से होगा नहीं तो रास्ते बुराई के कम नहीं है   और बात परम्पराओ की हो तो ऐसा है कि परंपरायेँ आदत बन कर दिमाग में बस जाती हैं लेकिन उस में भावनायेँ गायब रहती हैं…
परंपरा के नाम पर कोई खून बहाता है तो कोई दूध….
आज दूध बर्बाद करने का दिन है….
लगे रहो पर खबरदार अगर किसी गरीब को दिया तो
महा शिवरात्री जो है ।
उफ़ इतना ढोंग ,तथ्यो से परे की चीज़े ….******* मुझे तो घुटन होती है इन सब के बारे में बात करता हूँ तो सो मैं तो चला सोने आप रहो  ढोते इस बोझ को संसारी और संस्कारी गधे बनकर |